हमराही

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Wednesday, January 30, 2013

''...बापू राष्ट्रपिता हो तुम!..''


तुम सही मायने में नेताओं के 'बापू' निकले,जो पहले
से ही अपने सुपूतों के नक्शे कदम भाँप गये और जाते
जाते उन्हें तीन बंदर भेंट दे गये...........

तेरे ही देश में,
नेता के भेस में,
आज तेरे बंदर नज़र आते हैं
कहते हैं......... 













बुरा मत देखो
जो हो रहा उसे होने दो!

बुरा मत सुनो
कोई कुछ भी कहे कहने दो!

बुरा मत बोलो
क्योंकि तुम गुंगे और बहरे हो!
2.
इसलिए 

नहीं सुन पाते 
एक ग़रीब,आम आदमी की चीख,पुकार

नहीं देख पाते 
एक माँ की झुरीओं के पीछे का दर्द

नहीं बोल पाते
उनके अंतर्मन की वेदना,तड़प

3.
अगर यूँ कहें कि
अपने बारे में कुछ भी

बुरा मत देखो,
बुरा मत सुनो,
बुरा मत बोलो.

तो
तुम बापू के 'तीन बंदरों' को अपने में समेटे
असली नेता बन गये हो

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10 comments :

  1. बहुत बढ़िया अभिव्यक्ति.....
    प्रभावशाली...

    अनु

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  2. बहुत ही दुखद हालात हैं ....... :(
    ~सादर!!!

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  3. सटीक रचना, शुभकामनाएँ.

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    1. आभार जी,मार्गदर्शन करते रहें

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  4. सही कह रही हैं आप ! बापू के बंदरों की शिक्षा को भी आज के नेताओं ने अपनी सुविधा और मनोवृत्तियों के अनुरूप तोड़ मरोड़ कर ग्रहण किया है ! सशक्त अभिव्यक्ति !

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  5. मेरी समझ में एक बात आज तक नहीं आई कि गाँधी जी को राष्ट्र पिता-कहने का आधार क्या है - राष्ट्र का जन्म, या उसकी परिकल्पना क्या उनके द्वारा या उनके काल में हुई,और यह खंडित भारत उसी प्रतिफलन है? और यह भी कि उन से भी पूर्व काल के महापुरुष किस श्रेणी में रखे जायँ .

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  6. संगीता जी, शुक्रिया

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  7. shukriya dosto,sneh banaye rakhen

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