हमराही

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Saturday, December 7, 2013

तुम वोही हो ...

आज अपनी शादी को 24 बरस हो गए ,
एक पुरानी लिखी रचना पर आप सबका आशीर्वाद चाहती हूँ !


जिसने पलकों से चुने हैं दर्द मेरे
तुम वोही हो पागल हमदर्द मेरे /

जिसने दुख के दरिया में ना डूबने दिया
बनकर नाव पाँव मेरा उसमें रख दिया /

जिसने ज़िंदगी के अंधेरों में ना खोने दिया
मेरे वास्ते उजालों को गुलाम रख लिया /

जिसने आईने की तरह मेरा ख्याल रखा है
कहीं टूट ना जायूं ऐसे संभाल रखा है /

जिसने दुआओं से बलायों को रोक रखा है
ऐसे ढाल बनाकर हाथों को जोड़ रखा है /

जिसने ना छूने दिया धूप को ऐसे रोक रखा है
मेरे लौटने पे छाँव को ऐसे निकाल रखा है /

जिसने बिछूड़ कर दुनिया की ठोकरों में ना खोने दिया
ऐसे बाँधा अपने अहसासों से ना कभी रोने दिया /

जिसने प्यार के इस रिश्ते को विश्वास दिया है
इसे निभाकर एक सुंदर सा अहसास दिया है /

जिसने अपनी क़ाबलियत से हैरत में डाल रखा है
मेरे हर मसले का हल जैसे निकाल रखा है /

जिसने कहा ना छूने पाएँ जमाने की गरम हवाएँ
ऐसे दे डाली हैं मुझे दुनिया भर की दुआएँ /

जिसने इस दिल की धड़कन बनकर सकूँ दिया है
मेरी हर साँस ने उधार साँस उसी से लिया है /

जिसने मेरे होने को वाजिब वजूद दिया है
मेरी हर मुश्किल को ऐसे आसान किया है /
                    16 फरवरी,2012...

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