हमराही

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Wednesday, January 29, 2014

उसका वो पागलपन

याद है मुझे 
उसका वो पागलपन 
लिखता मेरे लिए प्रेम कवितायेँ 
जिनमें होते मेरे लिए कई प्रेम सवाल 
उसमें ही छुपी होती उसकी बेपनाह ख़ुशी 
क्योंकि जानता न था वो मेरे जवाब
वो उसकी आजाद दुनिया थी 
जिसमें नहीं था किसी का दखल
उसके दिल के दरवाजे पर खड़ी रहती मैं 
उस पार से उससे बतियाती 
उसका पा न सकना मुझे 
मेरा खिलखिला कर हँसना
और टाल देना उसका प्रेम अनुरोध  
देता उसको दर्द असहनीय 
जैसा आसमान में कोई तारा टूटता 
और अन्दर टूट जाते उसके ख़्वाब